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गणेश भगवान ने कितने अवतार लिए हैं और क्यों? जानिए इस ब्लॉग के ज़रिए…

हिन्दू धर्म के अनुसार गणपति को सर्वप्रथम पूजे जाने वाले देवता की उपाधि प्रदान की गई है। किन्ही भी भगवान की पूजा करने से पहले श्री गणेश जी की पूजा करनी आवश्यक है, वरना वह पूजा असफल मानी जाती है। इसलिए, प्रत्येक शुभ कार्य और त्यौहार में सर्वप्रथम गणपति जी की पूजा और आरती की जाती है, तत्पश्चात अन्य देवता की पूजा करते है।
गणेश पुराण के अनुसार भगवान गणेश जी के अनेकों नाम है। कोई उन्हें गजानन कहता है, तो कोई उन्हें विघ्नहर्ता, तो कोई लम्बोदराय।  जितने भगवान गणेश के नाम है, उतने ही इनके अवतार भी है। तो चलिए आपको बताते हैं कि गणेश भगवान के कितने रूप है और किस कारण उन्होंने यह अवतार लिए थे?

वक्रतुंड– भगवान गणेश का पहला अवतार वक्रतुंड अवतार माना जाता है। जब मत्सरासुर दैत्य ने घोर तपस्या कर भगवान शिव से वरदान के रूप में महाशक्तियों की प्राप्ति की,तब भगवान शिव के वरदान देने के बाद पूरे संसार में अत्याचार करना शुरू कर दिया। इस अत्याचार में उस दैत्य के साथ उसके दोनों पुत्र सुन्दरप्रिय और विषयप्रिय भी शामिल थे। पूरे संसार का हाल-बेहाल देख देवता गण भगवान शिव की शरण में पहुंचे, मत्सरासुर और उसके पुत्रों से संसार को बचाने के लिए प्रार्थना करने लगे। इसलिए, भगवान शिव जी ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे भगवान गणेश जी का आह्वान करें। देवताओं की अराधना के बाद, भगवान गणेश जी ने वक्रतुंड रूप धारण किया और दानव मत्सरासुर और उसके दोनों पुत्रों का संहार किया।

एकदंत– गणेश पुराण के अनुसार भगवान गणेश जी का दूसरा अवतार एकदंत है। भगवान गणेश का एकदंत का रूप धारण करने का कारण मद नामक राक्षस था। महर्षि च्यवन ने अपने तपोबल से एक मद नाम के दैत्य की रचना की। मद राक्षस ने गुरू शुक्राचार्य से शिक्षा प्राप्त की। शुक्राचार्य ने उस राक्षस को प्रत्येक विधा में निपुण बनाया। पूरी शिक्षा प्राप्त करने के बाद उस मदासुर ने देवताओं को सताना शुरू कर दिया। इसके बाद देवताओं ने भगवान गणेश जी की शरण ली। इसके बाद भगवान गणेश ने एकदंत का स्वरूप धारण किया और मदासुर का वध कर देवताओं को मदासुर के आतंक से छुटकारा दिलाया।

महोदर– ‘महोदर’ का अवतार धारण करने का कारण मोहासुर नामक असुर था। महोदर भगवान गणेश जी का तीसरा अवतार था। मोहासुर को भी शस्त्रों का ज्ञान दैत्य गुरू शुक्राचार्य ने ही प्रदान किया था। मोहासुर भी देवताओं की परेशानी का कारण था। इसलिए देवताओं ने भगवान गणेश से उससे मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। इसके बाद भगवान गणेश महोदर अवतार में प्रकृट हुए, जिनका स्वरूप बड़े पेट वाला था। और मूषक पर सवार होकर मोहासुर के नगर में उससे युद्ध करनें पहुंचें, तब मोहासुर दैत्य नें भगवान गणेश का इतना बड़ा महोदर स्वरूप देख कर भयभीत हो गए और बिना युद्ध करें भगवान गणेश जी को अपना इष्ट बना लिया।

गजानन– गणेश पुराण के अनुसार भगवान गणेश का चौथा अवतार गजाजन है। धन के मालिक कुबरे से लोभासुर नाम के एक दैत्य की उत्पत्ति हुई। वह लोभासुर दैत्य गुरू शुक्राचार्य के पास गया और उनके दिए गए निर्देश के अनुसार शिवजी की तपस्या की। भगवान शिव लोभासुर की भक्ति से प्रसन्न हुए, और निर्भय होने का वरदान दे दिया। इसके बाद, लोभासुर ने सभी देवताओं से उनके लोक छीनकर, उन्हें वहां से भगा दिया। सभी देवताएं अपनी परेशानी भगवान गणेश के पास लेकर गए। इसलिए, भगवान गणेश ने गजाजन रूप धारण किया और लोभासुर को पराजय कर दिया।

लम्बोदर– एक क्रोधासुर नाम के दैत्य ने ने सूर्यदेव की उपासना करके उनसे ब्रह्माण्ड पर विजय प्राप्ति का वरदान ले लिया। क्रोधासुर के इस वरदान के कारण तीनों लोक में हाहाकार मच गया। तब भगवान गणेश जी ने लम्बोदर रूप धारण कर उस क्रोधासुर के साथ युद्ध किया और उसे पराजय कर दिया।

विकट– जब भगवान विष्णु ने जलंधर नामक राक्षस का संहार करने के लिए जंलधर की पत्नी वृंदा का सतीत्व भंग किया, तब उस दौरान वृंदा ने एक कामासुर नाम के दैत्य को उत्पन्न किया। उस कामासुर दैत्य ने भगवान शिव की कठोर तपस्या कर तीनो लोकों पर विजय प्राप्त करने का वरदान प्राप्त कर लिया। इसके बाद, देवताओं पर कामासुर का अत्याचार बहुत अधिक बढ़ने लगा और उस वक्त सभी देवताओं ने मिलकर इस संकट को हरने के लिए भगवान गणेश की अराधना की। श्री गणेश भगवान विकट रूप लेकर कामासुर का अन्त किया। विकट रूप में भगवान गणेश का वाहन एक मोर था।

विघ्नराज– यह गणेश भगवान का सातवां अवतार माना जाता है। एक बार माता पार्वती अपनी सखियों के साथ बेहद जोर से हंसी, उनकी हंसी से एक विशाल पुरुष की उत्पत्ति हुई। पार्वती ने उसका नाम मम रखा, उसके बाद मम वन में तपस्या के लिए चला गया। मम ने गणपति को प्रसन्न कर वरदान के रूप में ब्रह्माण्ड पर राज मांगा। इसके बाद,  शम्बरसुर ने मम से अपनी पुत्री मोहनी से ब्याह कर दिया और शुक्राचार्य ने मम को दैत्यराज के सिंहासन पर बिठा दिया। जगत में ममासुर के अत्याचार बढ़ते गए और सारे देवी-देवताओं को कारागार में डाल दिया, तब देवताओं ने भगवान गणेश की भक्ति की। गणपति ने विघ्नराज का रूप धारण कर ममासुर का संहार कर देवताओं की रक्षा की।

धूम्रवर्ण– एक बार सूर्य देव को घमंड आ गया, तब सूर्य देव को एक छींक आई और उस छींक से एक दैत्य का जन्म हुआ, जिसका नाम अहम था। उस दैत्य ने भी गुरू शुक्राचार्य से शिक्षा प्राप्त की और गणेश भगवान की घोर तपस्या कर महाशक्तिशाली बन गया। उसी का  नाम अंहतासुर पड़ गया। जब वह क्रुर और अत्याचारी दैत्य बन गया , तब भगवान गणेश धूम्रवर्ण अवतार में प्रकृट हुए और अहंतासुर का वध किया। इस अवतार में गणेश जी का रंग धुए जैसा और शरीर में आग की ज्वालाएं फूट रही थी।

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